Wednesday, 10 June 2020

पांच पर्यटन स्थल प्रतिवर्ष


लाल किले की प्राचीर से, भारत के कर्मठ प्रधानमंत्री ने, भारत की समस्त जनता, 130 करोड़ लोगों से, आव्हान किया है, कि वे 1 वर्ष में कम से कम 5 स्थलों का भ्रमण करें। निश्चित ही, माननीय प्रधानमंत्री जी के इस आह्वान के पीछे कई कारण काम कर रहे हैं । जैसे भ्रमण के माध्यम से मिलने वाली पारिवारिक खुशी, खुशी से अतिरिक्त सकारात्मक ऊर्जा, सकारात्मक ऊर्जा से प्रभावी कार्य क्षमता, भावनात्मक एकात्मकता, स्थानीय रोजगार में वृद्धि एवं स्थानीय पर्यटक स्थल की अर्थव्यवस्था में सुदृढ़ता। ट्रेन, बस, होटल पर्यटन उद्योग इत्यादि में मुद्रा निवेश से रोजगार एवं अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिलेगा।
बच्चों ने जब सुना कि 1 साल में 5 स्थल, घूमने जाने के लिए मोदी जी कह रहे हैं। तो वह तो मारे खुशी के उछल पड़े। अभी तो मुश्किल से एक या ज्यादा से ज्यादा दो बार ही घूमने जा पाते हैं किंतु अब तो प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि आप साल में 5 स्थल, अवश्य भ्रमण करें । तो बच्चे कैलेंडर में घूमने का कार्यक्रम बनाने में जुट गए। भारतीय परिप्रेक्ष्य में पर्यटन को समझने के लिए , आय स्तर को भी ध्यान में रखना पड़ेगा। उच्च आय वर्ग ,मध्यम आय वर्ग, निम्न आय वर्ग, के रूप में, भारतीय जनसंख्या का विभाजन किया जाता है । अति उच्च आय वर्ग, तो केवल लगभग 1-2% ही है। यह वर्ग, भारत में उत्पादन, रोजगार इत्यादि में तो , अपना योगदान देता है, और यहीं से अपनी आय भी प्राप्त करता है । किंतु अपवादों को छोड़कर, खर्च करने की प्रवृत्ति की दृष्टि से, यह वर्ग विदेशी अर्थव्यवस्थाओं को पुष्ट करता है, क्योंकि अधिकतर खरीदारी विदेशों में करता है या फिर विदेशी वस्तुओं को खरीदने में अपनी शान समझता है।
लगभग 75-76% जनसंख्या मध्यम वर्ग में आती है और 22-23 प्रतिशत जनसंख्या निर्धन वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है।
मध्यमवर्ग को पुष्ट किया जाता है, तो उसका कुछ हिस्सा, निम्न वर्ग तक भी पहुंचता है, क्योंकि जीवन और समाज के सभी स्तर एवं क्षेत्र परस्पर एक दूसरे से संबद्ध हैं। उच्च आय वर्ग, अपनी मर्जी का मालिक होता है । निम्न आय वर्ग, जीने की मूलभूत जद्दोजहद के बीच पिस रहा होता है। मध्यमवर्ग, अपने आचार, विचार, व्यवहार से, राष्ट्र व समाज को प्रभावित, परिभाषित, एवं परिलक्षित करता है।
उन्नत पर्यटन की दृष्टि से मध्यमवर्ग बहुत बड़ी भूमिका निभाने की क्षमता रखता है।
इस वर्ग के, बच्चों की बातों को भी, महत्व मिलता है। बच्चों के भविष्य के प्रति भी, अतिरिक्त सजगता की प्रवृत्ति होती है। इस बड़े मध्यम वर्ग को भी, तीन वर्गों में सहज विभाजित किया जा सकता है। उच्च मध्य वर्ग, मध्यम मध्य वर्ग एवं निम्न मध्यवर्ग। उच्च मध्यम वर्ग स्तर के लोग, पर्यटन उद्योग को अच्छा मोबिलाइज करने की क्षमता रखते हैं । सितारा सुविधाओं का उपयोग करते हुए, सभी पर्यटक स्थलों पर भी, साफ-सफाई, सौंदर्य, सुविधाओं की अपेक्षा भी रखते हैं। नए नए पर्यटन स्थलों की खोज में रहते हैं। सामान्यतया सौंदर्य एवं सुविधाओं के आधार पर, पर्यटक स्थल का चुनाव करते हैं। मध्यम मध्य वर्ग का प्रतिशत भी यहां काफी बड़ा होता है। माना जाता है कि जनसंख्या के हिसाब से आधी से अधिक आबादी इसी हिस्से में आती है। मध्यम मध्य वर्ग की अपेक्षाएं तो उच्च स्तर की होती हैं किंतु आर्थिक संसाधन सीमित होने के कारण वह समायोजन करने की प्रवृत्ति भी रखता है। इच्छाओं और शौक को, नियोजित करते हुए, जरूरतों को पूरा करने पर ध्यान देता है।
पर्यटन उद्योग द्वारा इस वर्ग को, विभिन्न योजनाओं, स्कीमों इत्यादि के माध्यम से, प्रोत्साहित किया जा सकता है । सस्ते पर्यटन लोन, आकर्षक टूर पैकेजेज आदि उपलब्ध हों, तो यह आधी से अधिक आबादी वाला वर्ग, सकारात्मक क्रांतिकारी उछाल आने की क्षमता रखता है, और अर्थव्यवस्था को जमीनी स्तर पर सुदृढ़ आधार दे सकता है। सरकार द्वारा, सरकारी कर्मचारियों को, प्रति 4 वर्ष में, "एल. टी. सी." की सुविधा दी जाती है। इसे, कुछ शर्तों के साथ, प्रतिवर्ष भी किया जा सकता है । प्राइवेट कंपनियों में भी, इस तरह की सुविधा का प्रावधान, प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। विभिन्न योजनाओं एवं सुविधाओं का लाभ उठाते हुए भ्रमण एवं पर्यटन के माहौल में निम्न मध्यम वर्ग भी अपनी क्षमताओं के अनुरूपआकर्षित होकर मुद्रा विनिमय में अपना योगदान दे सकता है।
पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए समग्र रूप से कुछ बुनियादी तथ्यों पर भी काम करना आवश्यक है ।
  1. 1. सप्ताहांत पर , रेलगाड़ियों में अतिरिक्त बोगियों की व्यवस्था हो, ताकि तुरंत कार्यक्रम बनने पर भी , जहां भी ,परिवार जाना चाहें, उन्हें आरक्षण मिल सके । ब्रेकजर्नी की, भी सुविधा उपलब्ध होनी चाहिए । सड़कें भी चुस्त-दुरुस्त हों।
  2. 2. पर्यटन स्थलों पर , साफ-सफाई , बिजली, पानी और रहने की पर्याप्त व्यवस्था हो‌।
  3. 3. पर्यटन स्थल पर, स्थानीय लोक व्यवहार , मेले - ठेले, खानपान, हस्त - शिल्प इत्यादि स्थानीय अर्थव्यवस्था को, सुदृढ़ आधार प्रदान करते हैं । उनका भी प्रचार-प्रसार होना ही चाहिए।
  4. 4. पर्यटन के माध्यम से मनी ट्रांजैक्शन बहुत ज्यादा होता है। जो इकोनामी को स्ट्रांग बनाता है । स्वरोजगार के भी बहुत से क्षेत्र खुल जाते हैं।
  5. 5.विभिन्न पर्यटन स्थलों के , इतिहास, वास्तु, इत्यादि को ध्यान में रखते हुए 10 से 15 मिनट का वीडियो बनवा कर, स्थानीय संस्कृति , हस्तशिल्प, खानपान की झलक दिखाते हुए ,उस स्थल को प्रमोट किया जाना चाहिए । यह काम पर्यटन मंत्रालय द्वारा सहज ही किया जा सकता है।
भारतीय संस्कृति में, गंगा स्नान, तीर्थ यात्राएं, आध्यात्मिक महत्व के साथ-साथ, सामाजिक और आर्थिक पक्ष को भी, मजबूत करने का कार्य करती रही है। आधुनिक समय में भी यह तीर्थ यात्राएं, पर्यटन उद्योग की मजबूत नींव, के रूप में कार्य कर रही हैं । इसलिए यहां भी, आधुनिक सुख सुविधाओं का ध्यान रखा जाना अति आवश्यक है। प्रधानमंत्री के आह्वान से, निश्चित ही बच्चों को, उत्साह एवं परिवारों को, प्रोत्साहन मिलेगा । पर्यटन संबंधी बुनियादी सुविधाओं में सुधार होगा । सामाजिक एवं आर्थिक पक्षों में मजबूती के साथ, एक भारत श्रेष्ठ भारत की भावना के अनुरूप, समरसता एवं समरूपता को आत्मसात करते हुए, नई ऊर्जा उत्पन्न होगी।

Tuesday, 9 June 2020

The Haunted City of Bhangarh


The city of Bhangarh which once laded a kingdom has now been rendered as a pile of broken rocks, cracked structures and nothing but silence and loneliness all around. City which once chirruped owing to innumerable people and roared being ruled by valiant emperors has turned as lifeless as a long forgotten crypt. Enveloped by an abominable lull and an atmosphere of horror and mystery.
We stepped into the fort through a gate which was made between a long and high walled boundary, resembling the famous Great Wall of China. The ends of the wall could not be seen as they spread till eternity. Beyond the entry was a guided granite stoned path which went through like a corridor between historical ruins. The ruins of which once was the main bazaar or market of the city. This quite long path ended on a much higher and larger gate. Inside the gate was vast open grassland. On the left were some wilderness, a tomb and a pond; on the right was a temple.
Temple which was decent sized but, was mounted on a very high base. One had to climb around 50 stairs to reach to that height. The temple being historical was a simple stoned temple with no glittery idols, jewellery or decorations. It had a bell and some carvings on the wall. It very much resembled the stereotypical temples shown in Hindi movies and soaps.
On the front was the main building of the fort which was as high as the mountain behind it. Apparently only the lower three floors of the fort have remained. The top four floors have fallen off. The view from the third floor of the fort was immensely beautiful, serene and tranquil. With no human encroachment to be seen. The limits of the view extended beyond the boundaries of the city till infinity. On the right side, above the fort, on the mountain, was a small tomb which is the home to the tantric’s grave who cursed the once lively city of Bhangarh. It is believed that no one can go to that tomb. And whoever does, does not return.
The story of this tantric named Singhia is also a bit peculiar. The tantric was is love with the eighteen years old princess of Bhangarh, Ratnavati. When she was to get married, the tantric got to know that he cannot even see her, let alone meet her. The desperate tantric casted a spell on the oil being bought by the princess’ maid for her, so that she would get mesmerized by him and would marry him. However, the princess got to know about this and poured the oil on a rock. The rock rolled towards him and crushed the tantric to death. While Singhia was dying, he cursed the palace with the death of whoever dwelt within it. Soon after Ratnavati died in a war and the city was doomed. People also have said to see the princess’ spirit moving in the fort, in the night.
It was already beyond sunset when we reached this point and since it is not to be populated by visitors after 6pm, the fort commenced to get evacuated. We hid in to escape ourselves from getting caught and to stay there after dark. We somehow managed. After the tourists left, some people and priests gathered to perform some ritualistic proceedings and to chant mantras to bless the fort and to stop the prophecy from harming anyone. Everyone gathered at a small worship spot next to the wilderness.
Amidst of these terror filled proceedings were the beautiful peacocks which flew ecstatically from one tree to another, mewing incessantly. Hearing them carefully, one could compare their sound to someone’s screaming. And as it has been evident from the past, people have, many times, been fooled because of their mewing. Mesmerized by the beauty of these peacocks, the sound of chanting mantras and chirruping of the birds which returned to their nests after a tiring day, everything seemed to get slow. With time, everything got silenced and paused.
We sat under a tree and it got darker and darker. Fretting the hooligan monkeys, we talked of every random thing, got pictures clicked and also met another group of people who had come from Delhi for the same purpose and planned to stay there at night. We didn’t even realize when it turned completely dark. It was around 9 in the night. And we had no food or water with us. Our thirst and hunger forced us to move out of the fort. Though we did not encounter any unusual happening and reacted rationalistically, there was still an aura of arcane in our minds. Something which could be seen from our sixth sense. Mystery still prevailed and atmosphered our minds.
As we moved out of the gate, darkness appeared to get a little less. The moon shined in full mood above the haunted and silenced hills of Bhangarh. The white light seemed to bandage the pained history of the cursed city. The granite path of the bazaar, through which we entered, reflected the twilight and our path shined. To our much surprise the path ended at a god’s idol resurrected at the main gate of the fort. The small tomb in which the idol was placed was lit with earthen lamps and smelled of burning incense sticks. The god’s idol too radiated an essence of horror and terror.

Monday, 8 June 2020

भारतीय नारी


भारतीय संस्कृति में, सर्व गुण सम्पन्न शक्ति स्वरूपा माँ जगदम्बा, सदा - सर्वदा, वंदनीया एवं पूजनीया होने के अतिरिक्त, भारत की नारी को, हर युग में परिभाषित भी करती है। सती सावित्री, कैकयी , कौशल्या , सीता - उर्मिला, राधा रुक्मणि, शकुंतला, विद्योत्तमा, और न जाने कितने ही नाम भारतीय नारी की शक्ति को विभिन्न रूपों को दर्शाते रहे हैं और सम्पूर्ण भारतीय जनमानस के प्रेरणास्तोत्र एवं वंदनीय रहे हैं। वैदिक युग से चली आ रही इस परंपरा में , मध्ययुगीन भारत में गहरा आघात हुआ। आक्रांताओं द्वारा नारी शक्ति का उत्पीड़न किया गया। विदेशी संस्कृति को जबरन थोपा गया। भारत की सबला नारी को अबला नारी के रूप में परिवर्तित करने का कुत्सित प्रयास किया गया। लग भग १००० साल की गुलामी के दौर में भारतीय नारी के अपमान और तिरस्कार के दौरान भी , भारत के सभी क्षेत्रों से समय समय पर , भारत की नारियों ने, अपना गरिमामय रूप दर्शा कर, भारतीय नारी चेतना की जोत को बुझने से बचाया है। मेवाड़ की मीरा बाई ने भक्ति दिखाई।

महाराष्ट्र में जीजाबाई ने मातृ शक्ति के माध्यम से शिवा को छत्रपति शिवाजी बनाया। झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई ने शत्रु पर सामने से वार कर के वीरगति पाई। मध्य भारत की अहिल्याबाई होल्कर ने न्याय की पराकाष्ठा दिखाई। पूर्व भारत में रानी गांडिल्यू ने अपने क्षेत्र में अंग्रेज़ों से हार नहीं मानी और लगातार लड़ती रहीं। कित्तूर की रानी चेनम्मा ने, अंग्रेज़ों को दो बार परास्त करके अपने राज्य की रक्षा की, किन्तु तीसरी बार अंग्रेज़ों ने षड़यंत्र कर के रानी के कुछ सैनिकों को अपनी ओर मिला लिया और रानी के युद्ध में शहीद होने के बाद ही अँगरेज़ कित्तूर के किले को जीत पाए। राजपूत रानी पद्मिनी ने जौहर की ज्वाला से खिलजी को परास्त किया। नव विवाहित हाड़ी रानी ने , औरंगज़ेब की सेना को युद्ध में परास्त करने के लिए, पति की एकाग्रता को सुनिश्चित करने और स्वयं के प्रति मोह विछिन्न करने के लिए , अपना शीश काट कर निशानी के तौर पर रणक्षेत्र में भेज दिया था।
भारत के विभिन्न अंचलों में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जो भारत की नारी के सशक्त रूप का प्रमाण है।
क्षोभ का विषय है की सम्पूर्ण भारतीय जनमानस को कुछ ही नामों के अलावा अन्य महिलाओं के बारे में कोई उल्लेखनीय जानकारी ही नहीं है । लेकिन स्थानीय स्तर पर नारी के भिन्न भिन्न शक्ति स्वरूपों लोग आज भी नमन और वंदन करते हैं।

स्वतंत्रता के उपरान्त, संविधान प्रदत्त समानता के मौलिक अधिकार मिलने के कारण, समाज में व्याप्त, मध्ययुगीन नारी उपेक्षा की सोच में परिवर्तन आया है। शिक्षा एवं रोज़गार में सामान अवसर उपलब्ध होने के कारण स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद व्यापक रूप से माता पिता भी अपनी बेटियों को खुले आसमान में उड़ने के लिए प्रोत्साहित करने लगे हैं। यूँ तो सदियों की संकुचित मानसिकता एकाएक परिवर्तित नहीं हो सकती, किन्तु संविधान एवं सरकार के प्रोत्साहन से समाज के नज़रिये में व्यापक बदलाव भी आया है।

आज अग्नि पुत्री के रूप में टेस्सी थॉमस , भारत में मिसाइल प्रोजेक्ट देख रही हैं। तो किरण मजूमदार शॉ ने उद्योग जगत में अपना स्थान बनाया है, खेल जगत में तो मैरी कॉम , सान्या मिर्ज़ा, पी टी उषा , साइना नेहवाल , पी वी सिंधू , इत्यादि अनेक नाम उल्लेखनीय हैं , पर्यावरण जागरूकता फ़ैलाने वाली सालूमरादा थिमक्का हों या महिलाओं में आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ाने वाली मदुरै चिन्ना पिल्लै हों भारत की रक्षा की ज़िम्मेदारी उठाने वाली निर्मला सीतारमण हों अथवा भारत की साख पूरे विश्व में बढ़ाने वाली सुषमा स्वराज हों। यह सभी महिलाएँ भारत की सशक्त नारी के विभिन्न स्वरुप हैं सबकी प्रेरणा स्त्रोत हैं।
भारत की कानून व्यवस्था बनाने वाली संसद में लोकसभा अध्यक्ष के रूप में श्रीमती मीरा कुमार और श्रीमती सुमित्रा महाजन जी ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
भारत की इस पावन धरा पर एक तरफ अति साधारण परिवार की बहुत ही सामान्य महिला श्री मति लक्ष्मी बाई केलकर ने राष्ट्र प्रेम की अलख जगा , महिलाओं में मातृत्व , कर्तत्व, नेतृत्व को पोषित करते हुए विश्वव्यापी महिला संगठन खड़ा कर दिया जो आज भी समाज में जागृति व विस्तार में संलग्न है , और दूसरी ओर प्रथम प्रधान मंत्री की पुत्री श्रीमति इंदिरा गाँधी ने विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की महिला प्रधान मंत्री बनकर , पूर्वी पाकिस्तान को पश्चिमी पाकिस्तान के अत्याचारों से मुक्ति दिला कर , विश्व की सम्मानित एवं ताकतवर प्रधानमंत्री के रूप में पहचान बनाई। भारत में सभी महिलाएँ अपने अपने स्तर पर अपना उत्कृष्ट देने की क्षमता रखती हैं। मातृ शक्ति के रूप में तो, राष्ट्र निर्माण की ज़िम्मेदारी भी, महिलाएँ सदा से सहर्ष निभा रही हैं। किन्तु आधुनिक युग एवं वैश्विकरण के बढ़ते दबाव के अंतर्गत आज की महिलाएँ समाज से तुलनात्मक रूप से उदार सोच की अपेक्षा भी रखती हैं ताकि नारी रुपी , सरल , अविरल , रसभरी , सुरसरी भावी पीढ़ी को शक्ति - संस्कारों से सिंचित करके पुष्ट करती रहे।

Friday, 5 June 2020

" महिला अपराध", समाज अपराध का द्योतक है ।


जहां कन्या को पूजने की प्रथा है। पर नारी को माता ,बहन ,व पुत्री समान व्यवहार की परंपरा है । वहां कन्या भ्रूण हत्या ,दहेज हत्या, बलात्कार इत्यादि जैसे, महिला अपराध , संपूर्ण समाज को दोषी ठहराते हैं। कालातीत अवधियों से सभी समाजों में , अच्छे- बुरे कर्म सदा व्याप्त रहे हैं, किंतु समय विशेष में जब नकारात्मक कर्मों और उसके परिणामों की व्यापकता बढ़ जाती है ,तो सभी को जागरूक होने की आवश्यकता पड़ जाती है । सैकड़ों सालों की दासता से ग्रसित समाज में , महिलाओं के प्रति बर्बरता से भयभीत हो , कन्या भ्रूण हत्या पनपने लगी , तो, आधुनिक सुख सुविधा के लालच ने दहेज हत्या को बढ़ावा दिया और इंटरनेट के विस्तार ने अशिक्षा और अभद्रता के चलते, बच्ची से बूढ़ी तक उम्र की , सभी सीमाएं तोड़ते हुए , बलात्कार में पाशविकता की भी हद पार कर दी ।
सभ्य समाज कहे जाने वाले हम लोग ,अभी भी बेटे - बेटी के प्रति दोहरे मापदंड अपनाने से दोषमुक्त नहीं हुए हैं। हम लोग, सारे उपदेश सारी शिक्षाएं किशोरावस्था प्राप्त कर रही लड़की को तो देते हैं , किंतु इसी अवस्था में लड़के को स्त्री सम्मान और स्त्री गरिमा का पाठ पढ़ाना भूल जाते हैं । और तो और, जाने-अनजाने लड़कियों को लेकर होने वाले मजाकों का हिस्सा भी बन जाते हैं । लड़कियों के वस्त्रों पर तो टिप्पणी सहज है , परंतु स्वयं की सोच की परख, प्रश्न सूचक है ।
दोहरी मानसिकता से हमें उबरना होगा । परिवार, समाज की प्रथम इकाई है । पारिवारिक स्तर पर ही , सही सोच , सुसंस्कारों को , दृढ़ करना होगा ।


स्वतंत्र भारत में संविधान प्रदत्त स्त्री समानता ने ,महिलाओं के प्रति सकारात्मक माहौल पैदा किया है । शिक्षा - रोजगार में समानता के अवसर हैं । छोटे परिवारों के कारण बेटियों को भी लाड - प्यार में बढ़ावा मिल रहा है । किंतु सामाजिक ताने-बाने में खुद की बेटी और दूसरे की बेटी के प्रति मानदंडों में बहुत बड़ा अंतर दिखाई देता है । महिला ही महिला की सबसे बड़ी संरक्षक हो सकती है । माता के रूप में महिला को पुत्र और पुत्री दोनों को ही सुसंस्कार देने अति आवश्यक है । फिर वह महिला भले ही किसी भी ,आय वर्ग, जाति वर्ग ,धर्म वर्ग , क्षेत्रवर्ग से संबंध रखती हो । हमारे सामाजिक परिदृश्य में, सामान्यतया महिला की पुरुषों ( जैसे पति ,पिता, भाई ...आदि) के सामने बहुत मजबूत स्थिति नहीं होती। किंतु माता के रूप में ,पुत्र - पुत्री ,"मां" के आंचल से ही बंधे होते हैं । यहां "मां" को एक "महिला" का उत्तरदायित्व भी वहन करना ही होगा ।
स्कूलों में भी हर स्तर पर , महिला सम्मान और स्त्री गरिमा के अभ्यास आवश्यक है । यहां भी अधिकांशतः महिलाएं ही विद्यार्थियों को शिक्षित कर रही हैं । शैक्षिक एवं बौद्धिक क्षमताओं को निखारने के साथ-साथ , लगातार 12वीं कक्षा तक ( लगभग 14 वर्षों तक ) पारिवारिक संस्कारों को भी अभ्यासित करवाना, दकियानूसी विचार नहीं , अपितु स्वस्थ मानसिकता वाले समाज की नींव है । झुग्गी बस्तियों में, स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से, स्त्री - पुरुषों द्वारा, सम्मिलित रूप से, न केवल बच्चों में अपितु बड़ों में भी स्त्री गरिमा और सम्मान को प्रतिस्थापित करने की कोशिश करनी चाहिए । यह वह वर्ग है , जहां जीवन जीने की मूलभूत जरूरतों को पूरा करना ही एक चुनौती है , वहां इंटरनेट और मोबाइल, उनकी अतृप्त इच्छाओं के आसमान और वास्तविकता की गहरी खाई के मद्देनजर आसानी से , दिग्भभ्रमित कर देता है, और उनमें से कुछ, विकृत मानसिकता के चलते ,जघन्य अपराध कर देते हैं ।
प्रचलित उपभोक्तावादी संस्कृति में नारी का चित्रण सम्मान के रूप में कम , बल्कि वस्तु के रूप में अधिक हो रहा है। इस दिशा में संपन्न वर्ग को भी सोचने - समझने के अलावा मजबूती के साथ कुछ करने की आवश्यकता है । स्त्री को स्वयं को अबला नहीं, बल्कि सबला , समर्थ और शक्ति के रूप में पहचाना होगा । जागरूकता , सजगता , शिक्षा , स्वाभिमान, आत्मरक्षा, आत्मनिर्भरता ,सौम्यता, नैतिकता आदि गुणों की तुला में स्वयं को तोलना होगा । बेचारगी ,अनभिज्ञता, लोभ, लालच को भी त्यागना होगा ।

Tuesday, 2 June 2020

लॉक डाउन - एक मंथन


21वीं सदी के 20 वें वर्ष में "कोरोना" नामक विषाणु ने, पूरे विश्व को बंधक बना दिया है। चर्चा इस बात पर की जा सकती है , कि यह विषाणु मानव निर्मित है अथवा प्राकृतिक, किंतु सच्चाई यह भी है कि एक विषाणु पूरे विश्व को पंगु बना सकता है । निश्चित तौर पर मानव इस अल्पावधि अस्थाई समस्या से शीघ्र अतिशीघ्र मुक्ति भी पा लेगा । लेकिन इस बीच समस्त संसार के हजारों लोगों को इस विषाणु ने आहत भी कर दिया है और संपूर्ण जगत को कई सबक भी दे दिए हैं । जरुरत इस बात की है कि, सभी देश और उनके नागरिक वस्तुस्थिति का मंथन करके प्रकृति और मानव में सुंदर संतुलन स्थापित करें।
जिस प्रकार कमान से छूटा हुआ तीर,यह नहीं देखता कि उसके निशाने पर कौन है । उसी प्रकार "कोरोना विषाणु" ने, अमीर देश- गरीब देश, छोटा देश - बड़ा देश ,गोरा देश - काला देश, ठंडा प्रदेश - गर्म प्रदेश , समाज के सभी वर्गों ,राजा - रंक ,सभी जाति , सभी धर्मों, सभी भाषा, सभी नस्लों को अपने निशाने पर समान रुप से ले रखा है ।
अब यह जिम्मेदारी स्थानीय सरकारों, प्रशासन व समाज की है कि वह मानवता को बचाने के लिए, कितनी गंभीरता के साथ, स्वयं को बचाते हुए ,इस वायरस का सामना करते हुए , इसे निष्फल कर सकें ।
जागरूकता व समग्रता के साथ, प्रशासन से सहयोग एवं सरकारों के दिशा निर्देशों के अनुपालन के माध्यम से, इस "कोरोनावायरस" को निष्फल एवं नष्ट भी कर सकते हैं । इसके साथ ही साथ सामाजिक एवं व्यक्तिगत स्तर पर आत्म विश्लेषण करके, इस "लॉक डाउन" अवधि में कुछ ना कुछ उत्कृष्ट निकालकर राष्ट्रीय स्तर पर आंशिक योगदान करके गुणात्मक प्रभाव भी पैदा कर सकते हैं ।
निश्चित रूप से , बाजार आधारित अर्थव्यवस्थाओं पर यह संकट बहुत अधिक नकारात्मक प्रभाव डालेगा ।

औद्योगिक उत्पादन, वितरण, आवागमन इत्यादि लगभग ठप होने के कारण संपूर्ण वैश्विक अर्थव्यवस्था शिथिल हो जाएगी। फल स्वरुप विश्व स्तरीय आर्थिक मंदी का भी सामना करना पड़ सकता है तथा इससे समस्त संसारी प्रभावित भी होंगे । रोजगार एवं आय इत्यादि के अवसर भी कम हो सकते हैं। उत्पादन में कमी की समस्या के कारण, मांग और पूर्ति के असंतुलन के फलस्वरूप तीव्र महंगाई जैसी समस्याओं का सामना भी करना पड़ सकता है।
वास्तव में "कोरोनावायरस " महामारी संकट के कारण हुए, "लाॅकडाउन" के उपरांत का परिदृश्य भी बहुत सुखद नहीं, अपितु चुनौती भरा ही नजर आता है । प्रतिकूल परिस्थितियों को अनुकूल बनाने के लिए आवश्यकता इस बात की है कि, समाज के सभी लोगों को ,इस "लाॅकडाउन" के समय को, अपनी आत्मिक शक्ति को ,सुदृढ़ करने के लिए उपयोग करना चाहिए । ये समय अपने आत्मविश्लेषण में लगाना चाहिए । नकारात्मक विचारों को दरकिनार करके , अपने सकारात्मक , उत्साही विचारों और कार्यों से भर देना चाहिए।
इतने वर्षों से लगातार जीवन की आपाधापी, भागदौड़ मारामारी प्रतिस्पर्धा के चक्र में उलझे इंसान के लिए, यह "लॉक डाउन" उसे समय देता है अपने लिए जीने का, अपने परिवार में रमने का, अपने बच्चों में संस्कार सुदृढ़ करने का क्योंकि इंसान इस वक्त अपने घर में ही है । उसे कहीं जाने की बाध्यता नहीं है ना ही अचानक किसी के आने पर उसे अपनी दिनचर्या बाधित करने की जरूरत है ।
कहीं किसी दिखावे की जरूरत भी नहीं है। जो है, जैसा है, जितना है , उसमें परेशानी भी नहीं है । संयम और संतुलन से, संतोष भी प्राप्त हो जाता है "जान है तो जहान है " इस मूलमंत्र को जहन में रखते हैं , तो कभी कोई चीज या बात पर कोई असंतोष हो, छोटी-मोटी परेशानी हो , तो वह भी छूमंतर हो जाती है । "लॉक डाउन" ने समय दिया है, दोस्तों रिश्तेदारों से गप्पे लड़ाने के लिए , भूले बिसरे को याद कराने के लिए , अपने शौक को निखारने , रुचियों को संवारने के लिए, नई-नई चीजें और गुस्ताखियां करने के लिए, संपूर्ण विश्व को देखने और गहराई से समझने के लिए । "लॉक डाउन" सिखाता है कि, वास्तव में श्रेष्ठ जीवन जीने के लिए, संयम, संतुलन, अपनापन जैसे सद्गुण अधिक महत्वपूर्ण है । बाजारीकरण की अंधी दौड़ में ,सधे कदम से आगे बढ़ कर, स्वयं की पहचान कायम करना आना चाहिए।
"लॉक डाउन" में कार्यरत स्वास्थ्य-कर्मचारी, सुरक्षा-कर्मचारी, मूलभूत सेवा-कर्मचारी ,स्वच्छता-कर्मचारी ,मीडिया-कर्मचारी आदि, "कोरोना योद्धाओं" के प्रति ,अधिक सम्मान का भाव, आज के हर नागरिक के दिल में, बढ़ रहा है ।
भारत को इस महामारी से बचाने के लिए 25 मार्च से संपूर्ण "लॉकडाउन" किया गया है अर्थात सभी को अपने-अपने घरों में रहने के लिए कहा गया है। 25 मार्च से शुरू हुए नवरात्रों में जनसाधारण अपने-अपने सद्भाव - सदाचार में, थोड़ी-थोड़ी भी वृद्धि करता है तो निश्चित रूप से सकारात्मक ऊर्जा में बहुत अधिक गुणात्मक वृद्धि होगी और नकारात्मक कोरोना का क्षरण शीघ्र अति शीघ्र होगा ।
इन "कोरोना योद्धाओं" का मनोबल बढ़ाने के लिए, यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने सद्गुणों को सुदृढ़ करेगा तो "कोरोनावायरस" संकट जल्द ही समाप्त भी होगा और किसी भी तरह का अधिक नुकसान भी नहीं कर पाएगा।

Friday, 29 May 2020

दोहरा कर बोझ या नई सोच ?

वर्षो से चली आ रही विकास की सुस्त चाल और कम्प्यूटर क्रांति से पहले की मानसिकता के चलते, बुलेट ट्रैन और स्मार्ट सिटी जैसी अवधारणाओं उतपन्न होना स्वाभाविक है। इसी प्रकार भारतीय नागरिकों द्वारा उठाई हा रही 'दोहरी कर' व्यवस्था को अगर इकहरी व्यवस्था में बदलने की बात को जाये तो तथाकथित विशेषज्ञों को तुरंत तर्क होगा को विकास पंगूहो जायेगा ?
इतने वर्षो से विकास को पैरोकार मणि जाती रही है "दोहरी कर व्यवस्था" के बावजूद प्रति वर्ष घटे की अर्थव्यवस्था ही बढ़ती चली आ रही है और तो और "करो" द्वारा एकत्रित आय कितने हो घोटालो में डूबती जा रही है। समानांतर कर से कर चोरी काले धन मई भी इजाफा हो रहा है। कर चोरी रोकने के लिए बड़े-बड़े कदम विज्ञापनों पर करोड़ो का खर्च , "कर" एकत्र करने का लम्बा चोदा जटिल संस्थागत धनचे का घरच और भी न जाने क्या - क्या।
सेस, वाट, टोल टैक्स, एक आम भारतीय नागरिक अपनी साधारण सी आय में से कितने "कर" सरकार को दे देता है। सोचने का विषय है


कर्मचारी सबसे पहले अपने चेतन में से "आयकर" देता है भले ही उस की ' आय ' उसके परिवार की जरूरते पूरी भी कर पा रहा हो या नहीं , सामाजिक स्तर पर भी उसके व्यक्ति गत स्तर की सुरक्षा पर पाये या नहीं, आकस्मिक बाधाओं से स्वयं और परिवार को बचाने की क्षमता रखती हो अथवा नहीं, प्रगतिशील समाज और विकसित होने की दिशा में बढ़ रहे राष्ट्र की नव पीढ़ी अर्थात स्वयं के बच्चो की आकांक्षाओं और क्षमताओ को पोषित करने की क्षमता रक्खति हो या नहीं। किन्तु उस कर्मचारी को "आयकर" तो देना ही होगा क्यूंकि वह सरकारी दस्तावेजो, दर्शनीय (दिखाई देता) आयकर डे कर्मचारी है।
अगर मंदी के दौरान या किसी कारणवश वह कर्मचारी बेरोज़गार हो गया हो तो बात अलग है और स्पष्ट है की वह ' आयकर ' नहीं देगा और यह सबको मान्य भी होगा किन्तु इस बेच उसका और उसके परिवार के खर्च के बारे में भी क्या किसी को कोई सरोकार होगा ? इतने सालो ' जिन्हे ' आयकर ' दिया है क्या उन्हें भी ? कदापि नहीं ?
  1. कर्मचारी कुछ खरीदता है तो टैक्स
  2. कुछ पहनता है तो टैक्स
  3. कुछ खता है तो टैक्स
  4. कहीं जाता है तो टैक्स
  5. कहीं रहता है तो टैक्स
कुछ मनोरंजन कहता है तो टैक्स आदि ये सब किन के अतिरिक्त टैक्स सरकार को ही दे रहा है पर फिर भी सामान्य सुविधाए नहीं मिलती मतलब यह है की अगर वह कमा रहा है तो भी टैक्स और खर्च कर रहा है तब भी टैक्स।
खर्च कर रहा है तब वह स्वं को संतुष्ट भी कर अहा है उस वक़्त टैक्स देना इतना बुरा महसूस नहीं होता किन्तु मेहनत की कमाई में से, पारिवारिक जरुरतो को रोक कर, जब वह "आयकर" देता है और फिर सरकारी घोटाले और उपव्यय होता है तो निशांधे वह काफी कष्ट करी होता है और फिर चतुर लोगों द्वारा कर चोरी के हत्कंडे अपनाये जाने शुरू होते है। वो क्यों न प्रगतिशीलता के चलते, भारत में भी, नै सोच को अपनाते हुए आयलर मुक्त अर्थव्यवस्था की सुरुआत की जाती।
किन्तु इसके साथ ही सरकार द्वारा विकास हेतु धन इकट्ठा करने के उदेश्ये से १० लाख प्रतिवर्ष से अधिक आय वालो को इस बजट में अपनी अनुमानित कर राशि' अपने गप्प अकाउंट या कोई नया अकाउंट में ट्रांसफर करवा दी जाये ताकि व्यक्ति का पैसा व्यक्ति के नाम ही रहेगा और सरकार के पास काम / विकास के लिए फण्ड इकठा होगा।
नवभारतनिर्माण नई उमीद व नई सोच के साथ।

Thursday, 28 May 2020

The basis of Indian economy - Indian woman

Indian women performs laborious labor, works in fields, is also arable, even in the organizational sector their presence is registering at every level and contributing to the economy. Women who carry burdens of temples, charity, pilgrimage- bathing, are jewelery lovers, hand pick over husband’s pocket (women's contribution to the economy?) What are women doing? On marriages, couples - congestions, etc., spending extravagance through rituals, appear heavy on men's pockets, women don’t they put the economy in crisis? Throughout the year they are busy in the name of festivals, and in the kitchen; time-consuming, modern women. Are they able to can prove their value and dedication to society, nation and economy?

Indian society has been religious, emotional, and conservative since millennia. During the last 1000 years of deliberate suppression, the society has been able to with stand the onslaught of foreign aggressors and has retained its character, but some of the malpractices also crept in and gained roots in the society. From time to time, the great wise men and social reformers like Tulsi, Kabir, Dayanand Saraswati, Raja Ram Mohan Rai, Ishwar Chand Vidya Sagar, and Swami Vivekananda etc and other during their own time and regions, tried to get rid of it. There was some degree of success and there is still a lot of work to be done.
In the Indian context, suppressed-downtrodden woman, when she connects herself with Indian culture as a mother, she automatically gets the power and attains Narayani form, to run the society, nation and economy.

Onam, Pongal, Lohri are initiation of the Festivals starting with, the dawn of the day of Gods on Makar Sankranti, only the simple and accessible food items like Khichdi so that it reaches the last to the lowest person in the society, these charitable women continue their donations in the name of charity. Apart from local economy through pilgrim baths, the economy reinforces the economy from one end to the other. In addition to this, indirectly, the "money" used in these activities is also being streamed in the society and the economy. In the name of pilgrim place, wherever women go, they carry their currency with them to make economy stronger.
The jewelery loving woman, who steels money from her husband's pocket, preserves the mood for her husband and family as well as for society and the economy. The most sophisticated and refreshing example of this is the worldwide recession of 2008, when the world was in hitch holes in the vortex of the slowdown of all the economies, there was no special impact on our Indian economy. Foreign economists adorned India on this situation, and then they came to know that sensible finance management and saving trend of the Indian woman kept the economy steady.
Traditional customs such as marriages, etc. have almost run throughout the society in the whole year. These custom are managed by the lady of the house. Through these customs, the virtue of almost all the main sections of the society is also achieved and then they are also nurtured. Women, who know the meaning of fatigues, actually spend as per the ability and capacity of the family to make the best contribution in the family's liability and economy.
Holi - Diwali, Eid, Christmas, Shitala Ashtami, Chhat pooja, Durga Pooja, Guru Poojan, Ganesh Chaturthi, Shama Parv, etc. From the east to the west and from north to south, the whole society fills with enthusiasm. Festivities Provide employment to the society as well, it increases and emphasises the value of farmer’s crop production. Provides opportunities for industries in the production, through merchants, make the economy prosper through money circulation. In the western economy, throughout the year, music concerts, or by different events, their economy is not strengthened as compared to Diwali in India. Globally business houses want to encash the opportunity on the occasion of Diwali in India. According to the statistics, the business of the entire year 35% -40% alone accounts for Diwali. Government and Private Business houses, for them, economic planning begins 8-10 months before Diwali and they make their plans and strategies.
Festivals that run throughout the year give the economy a different level and provide strength and stability.
It is also worth mentioning that no matter what product or advertisement it is preferred to the family and the woman is kept in the main role. “सर्वे भवन्तु सुखिना, सर्वे सन्तु निरामया” inspires the depth of the life force and economy of India due to the spirit and the nature of the festival. The tradition of celebrating different days, on the basis of our festivals, has inspired the west of celebrating different days, but it is limited only to exchange of cards and gift items. Being limited cannot neglect the effect. Whereas we have festivals like Raksha Bandhan, or Bhai Dauj, Karwa Chauth or Chhat festivities, all in the society, without any discrimination, become indistinguishable during that time. It goes without saying that "woman" is the axis of all of these. We have also been told that "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता" means that where the women are honoured the deities reside there.
Perhaps Indian women carrying burdens like, Orthodox, Traditionalists, are sublime and not so bad. They are guiding force of the Indian Economy.